India US Trade War: डोनाल्ड ट्रंप भारत से क्यों नाराज़ हैं? जानिए 5 प्रमुख कारण

India us trade war शुरू हो चुका है : भारत और अमेरिका दो बड़े लोकतंत्र हैं, और इन दोनों के रिश्ते दुनिया की राजनीति और व्यापार में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिका के रिश्तों में गर्मजोशी दिखी थी, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ ऐसे मुद्दे भी रहे जिन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को भारत से नाराज़ कर दिया। india us trade war शुरू हो चुका है !

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यहाँ हम आपको बताते हैं उन 5 प्रमुख कारणों के बारे में जो ट्रंप की भारत से नाराज़गी की जड़ में हैं:

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डोनाल्ड ट्रंप भारत से क्यों नाराज़ हैं? जानिए 5 प्रमुख कारण

1.ब्रिक्स देशों की बढ़ती ताकत और अमेरिका की चिंता

ब्रिक्स (BRICS) विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक प्रमुख समूह है, जिसमें भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ ईरान, इथियोपिया, इंडोनेशिया, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं। यह समूह वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा है, जो अमेरिका और उसके पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए चिंता का विषय है।

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डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशें

ब्रिक्स के सदस्य देश एक वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय प्रणाली और स्थानीय मुद्राओं के प्रयोग को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। ट्रंप कई बार इन देशों को 100% तक टैरिफ़ लगाने की चेतावनी दे चुके हैं। उनका कहना है कि यदि ब्रिक्स अपनी स्वतंत्र मुद्रा शुरू करता है, तो उसे अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म करने के लिए तैयार रहना होगा।

रूस-चीन व्यापार और डॉलर का दबदबा

पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद से चीन, रूस से रूबल में तेल खरीद रहा है। अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस के अनुसार, 2022 में विश्व के लगभग आधे अंतरराष्ट्रीय लेन-देन अमेरिकी डॉलर में हुए। डॉलर के इस प्रभुत्व ने अमेरिका को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक मजबूत स्थिति दी है।

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिक्स का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ईरान जैसे नए सदस्य के जुड़ने और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन की चर्चा ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है। उनके अनुसार, डॉलर तभी कमजोर होगा जब ये देश आर्थिक रूप से अधिक मजबूत होंगे, लेकिन उच्च टैरिफ़ लगने पर इनकी अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है और अमेरिका का प्रभाव कायम रहेगा।

ब्रिक्स के कई सदस्य नई नीतियां और परियोजनाएं आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन भारत के धीमे रुख के कारण कई पहलें ठप पड़ जाती हैं। इस वजह से भारत पर अक्सर आरोप लगता है कि वह अमेरिका के दबाव में ब्रिक्स की ताकत को सीमित कर रहा है।

उनका यह भी कहना है कि अमेरिका पर निर्भरता केवल भारत तक सीमित नहीं है—ब्रिक्स के कई अन्य सदस्य भी इसी स्थिति में हैं। इसके बावजूद, भारत को अमेरिकी टैरिफ़ नीतियों का सीधा सामना करना पड़ रहा है।

2. पीएम मोदी की चीन यात्रा और अमेरिका की बेचैनी

2020 में गलवान घाटी में हुए भारत-चीन सैन्य संघर्ष के बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन की यात्रा करने जा रहे हैं। वे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट में भाग लेंगे।

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हालिया कूटनीतिक गतिविधियां

पिछले वर्ष अक्टूबर में, प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात रूस के कज़ान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हुई थी। इसके अलावा, जून 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बीजिंग पहुंचे थे, जिसके तुरंत बाद विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भी चीन का दौरा किया।

भारत-चीन संबंधों में सुधार की कोशिश

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान विशेषज्ञ प्रो. रेशमी काज़ी के अनुसार, भारत और चीन वर्तमान में द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका के लिए सबसे बड़ा भू-राजनीतिक चुनौती अब चीन है, और इस चुनौती का संतुलन बनाने के लिए उसे भारत की आवश्यकता है।

यात्रा, व्यापार और संपर्क में बदलाव

वरिष्ठ पत्रकार नयनिमा बासु का मानना है कि भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली एक सकारात्मक संकेत है। उनकी राय में, पीएम मोदी की इस यात्रा के बाद बीजिंग और दिल्ली के बीच सीधी हवाई सेवा शुरू होने की संभावना है, साथ ही वीज़ा प्रतिबंधों में भी ढील दी जा सकती है।

अमेरिका की नाराज़गी के कारण

विश्लेषकों का कहना है कि भारत-चीन नज़दीकी अमेरिका को पसंद नहीं आ रही है। रूस से सस्ता तेल खरीदना अमेरिका के लिए केवल एक बहाना है। नयनिमा बासु का तर्क है कि यदि भारत तेल खरीदना बंद भी कर दे, तो भी अमेरिका टैरिफ़ लगाने से पीछे नहीं हटेगा।
यह भी याद रखना चाहिए कि जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका गए थे, तो डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को “टैरिफ़ किंग” कहा था। ऐसे में टैरिफ़ से पूरी तरह बचना मुश्किल था, हालांकि इसे सीमित रखा जा सकता था।

 

3. ऑपरेशन सिंदूर का ट्रंप को क्रेडिट न मिलना

अपने पिछले कार्यकाल के दौरान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के साथ काफ़ी मैत्रीपूर्ण रुख़ रखते थे, लेकिन इस बार उनका रुझान काफ़ी सख़्त नज़र आ रहा है।

हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने भारत पर जवाबी हमले किए, हालांकि कुछ ही समय बाद दोनों देशों ने संघर्ष विराम की घोषणा कर दी। इस संघर्ष विराम को लेकर ट्रंप बार-बार दावा करते रहे कि इसे संभव बनाने में अमेरिका की भूमिका रही, जबकि भारत ने स्पष्ट कर दिया कि यह निर्णय पूरी तरह द्विपक्षीय था और इसमें अमेरिका का कोई हाथ नहीं था।

नाराज़गी की असली वजह

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तेज़ी से सैन्य टकराव में बदल गया था। इस दौरान ट्रंप को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्हें व्यक्तिगत तौर पर धन्यवाद देंगे या कम से कम एक औपचारिक फोन कॉल करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, यह अनदेखी ट्रंप के लिए नाराज़गी का बड़ा कारण बन गई।

नोबेल की चाहत

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप की नाराज़गी का एक और पहलू है — शांति का नोबेल पुरस्कार। पाकिस्तान, कंबोडिया और इज़राइल जैसे कुछ देशों ने पहले ही ट्रंप को नोबेल दिलाने की मांग की है। ऐसे में अगर भारत उनके मध्यस्थता प्रयासों की सार्वजनिक सराहना करता, तो यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि बन सकती थी। लेकिन भारत ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधी रखी, जिससे ट्रंप का असंतोष और बढ़ गया।

4. Non-Tariff Barriers: छिपे व्यापार अवरोध

भारत ने अमेरिका के कई उत्पादों पर भले ही आयात शुल्क कम किया हो, लेकिन गैर-टैरिफ अवरोध (Non-Tariff Barriers) बनाए रखे:

  • अमेरिकी डेयरी, मेडिकल डिवाइसेज़ और कृषि उत्पादों पर कड़े मानक और लाइसेंसिंग शर्तें लगाईं।
  • ई-कॉमर्स पर नियंत्रण और डेटा लोकलाइजेशन जैसे नियमों से अमेज़न, वॉलमार्ट और अन्य अमेरिकी कंपनियों को नुकसान हुआ।
  • ट्रंप का मानना था कि भारत खुले बाजार की बात करता है, लेकिन नियमों के जाल से अमेरिकी कंपनियों को बाहर रखता है।

5. भारतीय-अमेरिकी समुदाय का समर्थन बाइडेन को मिलना

डोनाल्ड ट्रंप को इस बात की भी शिकायत रही कि:

  • अमेरिका में रहने वाला भारतीय समुदाय, खासकर प्रोफेशनल वर्ग, जो बाइडेन और डेमोक्रेट्स का समर्थक बन गया।
  • ट्रंप ने “Howdy Modi” जैसे कार्यक्रमों से भारत को खुश करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें चुनाव में अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

उन्हें लगा कि उन्होंने भारत के लिए काफी कुछ किया, लेकिन राजनीतिक और सामुदायिक समर्थन उन्हें अपेक्षित स्तर पर नहीं मिला।

निष्कर्ष: भारत की प्राथमिकता – अपने राष्ट्रीय हित

डोनाल्ड ट्रंप की भारत से नाराज़गी के कई कारण हैं—ट्रेड डील पर असहमति, चीन के साथ संतुलित संबंध, ऑपरेशन सिंदूर का क्रेडिट, नॉन-टैरिफ बैरियर्स और अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय का रुख।

लेकिन यह भी सच है कि भारत की विदेश नीति हमेशा “भारत प्रथम” (India First) सिद्धांत पर आधारित रही है।

  • भारत ने हर मुद्दे पर अपने आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी।
  • अमेरिका के साथ साझेदारी को मजबूत रखा, लेकिन अपने स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार भी सुरक्षित रखा।
  • चीन, रूस और अमेरिका—इन सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना भारत की भूराजनैतिक जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में, हर देश अपने नागरिकों और भविष्य की सुरक्षा को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। भारत ने भी यही किया—चाहे इसका मतलब कुछ वैश्विक नेताओं की नाराज़गी क्यों न हो।

भविष्य में, भारत और अमेरिका के रिश्ते तभी और मजबूत होंगे जब दोनों देश एक-दूसरे के व्यापारिक और रणनीतिक हितों का सम्मान करते हुए साझेदारी को आगे बढ़ाएँगे।

Source :Googel News

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